सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि सरकार की आलोचना के लिए किसी पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए

सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी पत्रकारिता कर रहे लोगों के लिए सुकूनदेह हो सकती है कि सरकार की आलोचना करना पत्रकारों का अधिकार है। हालांकि देखने की बात है कि सरकारें इस बात को कहां तक स्वीकार कर पाती हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश के एक पत्रकार के खिलाफ दायर मुकदमे की सुनवाई करते हुए की। इस संबंध में अदालत ने संविधान के अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़े अनुच्छेद की याद भी दिलाई और पत्रकार को गिरफ्तारी से संरक्षण प्रदान कर दिया।

  • सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार 05-10-2024 को अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि सरकार की आलोचना के लिए किसी पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने यूपी पुलिस को नोटिस जारी कर जवाब मांगा हैं। कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा है कि पत्रकार को उसके विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19 (1) से सुरक्षित है। केवल सरकार की आलोचना के लिए किसी पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए।

दरअसल, सरकारों को अपनी आलोचना कभी रास नहीं आती, मगर पिछले कुछ वर्षों में सरकारें इसे लेकर प्रकट रूप में सख्त नजर आने लगी हैं। सरकार के खिलाफ अखबारों में खबरें, लेख या कोई वैचारिक टिप्पणी करने पर कई पत्रकारों को प्रताड़ित करने की घटनाएं देखी गई हैं। यहां तक कि कुछ पत्रकारों पर गैरकानूनी गतिविधि निवारण अधिनियम के तहत भी मुकदमे दर्ज किए गए, जिसमें जमानत मिलनी मुश्किल होती है। इस धारा के तहत कई पत्रकार अब भी सलाखों के पीछे हैं। कुछ मामलों में पहले भी सर्वोच्च न्यायालय कह चुका है कि सरकार की आलोचना देशद्रोह नहीं माना जा सकता। मगर किसी सरकार ने उसे गंभीरता से नहीं लिया।

कुछ राज्यों में ऐसे भी उदाहरण हैं, जब सरकार की किसी नीति या फैसले की आलोचना करने पर पत्रकारों को पकड़ कर थाने में बंद किया गया और उनके साथ मारपीट की गई। दरअसल, इस तरह की कोशिशें सच्चाई को सामने लाने से रोकने के लिए की जाती हैं। जबकि स्वस्थ लोकतंत्र का तकाजा है कि पत्रकारीय आलोचना को प्रोत्साहित किया जाए। इससे सरकारों को अपनी नीतियों के निर्धारण, योजनाओं के संचालन आदि में सुधार करने का अवसर मिलता है। आलोचना को रोक कर गलत नीतियों को चलाते रहना एक तरह से लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करने का प्रयास ही होता है।

कुछ राज्यों में ऐसे भी उदाहरण हैं,

जब सरकार की किसी नीति या फैसले की आलोचना करने पर पत्रकारों को पकड़ कर थाने में बंद किया गया और उनके साथ मारपीट की गई। दरअसल, इस तरह की कोशिशें सच्चाई को सामने लाने से रोकने के लिए की जाती हैं। जबकि स्वस्थ लोकतंत्र का तकाजा है कि पत्रकारीय आलोचना को प्रोत्साहित किया जाए। इससे सरकारों को अपनी नीतियों के निर्धारण, योजनाओं के संचालन आदि में सुधार करने का अवसर मिलता है। आलोचना को रोक कर गलत नीतियों को चलाते रहना एक तरह से लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करने का प्रयास ही होता है।

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